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‘2014 का जनादेश सिर्फ बीजेपी का नहीं था…’ शर्मिष्ठा मुखर्जी ने बताई पिता की राय

June 27, 2026 Source: Indivox News

‘2014 का जनादेश सिर्फ बीजेपी का नहीं था…’ शर्मिष्ठा मुखर्जी ने बताई पिता की राय
‘2014 का जनादेश सिर्फ बीजेपी का नहीं था…’ शर्मिष्ठा मुखर्जी ने बताई पिता की राय
‘2014 का जनादेश सिर्फ बीजेपी का नहीं था…’ शर्मिष्ठा मुखर्जी ने बताई पिता की राय
**Sharmistha Mukherjee on PM Modi:** पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अपनी राय खुलकर रखी है। अपनी किताब *Pranab, My Father: A Daughter Remembers* के प्रमोशन के दौरान उन्होंने कहा कि चाहे कोई पीएम मोदी से सहमत हो या असहमत, लेकिन "ब्रांड मोदी" को नजरअंदाज करना संभव नहीं है। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी का भारतीय राजनीति में एक अलग प्रभाव और पहचान है। शर्मिष्ठा मुखर्जी ने इस दौरान 2014 लोकसभा चुनाव के बाद का एक दिलचस्प किस्सा भी साझा किया। उन्होंने बताया कि चुनाव परिणाम आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति भवन में उनके पिता प्रणब मुखर्जी से मिलने पहुंचे थे। बातचीत के दौरान प्रणब मुखर्जी ने मोदी से चुनाव के बारे में उनका विश्लेषण पूछा। पीएम मोदी ने कहा कि लगभग तीन दशक बाद किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला है। इस पर प्रणब मुखर्जी ने मुस्कुराते हुए पूछा, "और क्या?" जब मोदी कुछ नहीं बोले, तो उन्होंने समझाया कि 2014 का चुनाव इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि पहली बार किसी पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में एक नए चेहरे को पहले से घोषित किया था और जनता ने सीधे उसी नेतृत्व पर भरोसा जताया। शर्मिष्ठा ने कहा कि राजनीतिक विचार अलग होने के बावजूद उनके पिता और प्रधानमंत्री मोदी के बीच हमेशा सम्मानजनक और सौहार्दपूर्ण संबंध रहे। उनके मुताबिक, यही स्वस्थ लोकतंत्र की असली पहचान है। प्रणब मुखर्जी का मानना था कि 2014 में बीजेपी को मिला प्रचंड बहुमत केवल पार्टी की जीत नहीं था, बल्कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जनता का सीधा जनादेश भी था। उन्होंने 2014 की एक और यादगार घटना का जिक्र करते हुए कहा कि जब पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी संसद पहुंचे और प्रवेश से पहले संसद की सीढ़ियों पर झुककर प्रणाम किया, तो इस भावुक क्षण ने करोड़ों भारतीयों का दिल जीत लिया। प्रणब मुखर्जी भी इस प्रतीकात्मक कदम को भारतीय लोकतंत्र और संसद के प्रति सम्मान का एक ऐतिहासिक उदाहरण मानते थे।