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हत्या और कुकर्म के मामलों में बड़ी राहत, सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को किया बरी

September 5, 2026 Source: Indivox News

हत्या और कुकर्म के मामलों में बड़ी राहत, सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को किया बरी
निचली अदालतों और राज्यों के हाई कोर्ट से सजा पा चुके लोगों के 3 मामलों में पिछले 1 हफ्ते के अंदर सुप्रीम कोर्ट फैसला पलट चुका है। एक मामला अपहरण और हत्या से जुड़ा है। दूसरा केस कुकर्म का है और तीसरा मर्डर केस का है। तीनों ही मामलों में सबूतों की कमी आरोपियों की रिहाई का सबसे बड़ा कारण बनी। नई दिल्ली: एक हफ्ते के अंदर तीसरी बार ऐसा हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत से सजा पा चुके आरोपी को बरी कर दिया। तीसरा और सबसे ताजा मामला अपहरण और हत्या से जुड़ा है। इसमें कोर्ट ने सबूतों के विश्लेषण पर सवाल खड़े किए। सर्वोच्च अदालत ने अभियोजन पक्ष की उस थ्योरी में कमियां निकालीं, जिसके जरिए आरोपी को अपराध से जोड़ा गया था। *अपहरण-हत्या का केस* दरअसल, साल 2012 में तेलंगाना के एक व्यक्ति का अपहरण कर लिया गया। उसके पिता ने 23 लाख रुपये की डिमांड की गई। पिता सिर्फ 1.5 लाख रुपये की फिरौती ही दे पाए। आरोपियों ने अपहरण किए गए शख्स को जान से मार डाला और खुलासा किया कि लाश एक फ्लैट के अंदर फ्रिज में रखी है। आरोपियों में से एक की मौत मुकदमे की सुनवाई के दौरान हो गई। इस बीच ट्रायल कोर्ट ने बाकी पांच आरोपियों को दोषी ठहरा दिया। तेलंगाना हाई कोर्ट ने सबूतों की समीक्षा की और चार को बरी कर दिया, लेकिन एक को दोषी ठहराया। *कोई ठोस सबूत ही नहीं* अपहरण और हत्या के इस मामले पर अपना आदेश सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गला घोंटने का संकेत देने वाली पोस्टमार्टम रिपोर्ट और शव मिलने के अलावा आरोपी को हत्या से जोड़ने वाला कोई ठोस सबूत नहीं है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और के. विनोद चंद्रन की बेंच ने दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए कहा कि ऑटोप्सी रिपोर्ट से यह साबित होता है कि पीड़ित की मौत 'दम घुटने और गला घोंटने' के कारण हुई थी और शव एक अपार्टमेंट के अंदर रेफ्रिजरेटर में छिपाकर रखा गया था। लेकिन इनके अलावा, 6 आरोपियों को हत्या या उस फ्लैट से जोड़ने के लिए भरोसे लायक कोई सबूत नहीं है। *लड़के से कुकर्म का आरोप* एक दूसरे मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने दोषी ठहराए गए शख्स को रिहा कर दिया। इस मामले में एक आदमी पर स्नैक्स का लालच देकर एक लड़के के साथ कुकर्म करने का आरोप लगा था। उसे अंबाला की अदालत ने मार्च 2007 में अप्राकृतिक यौन संबंध और हत्या के 'अपराध' के लिए अप्रैल 2010 में दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अक्टूबर 2022 में उसकी अपील खारिज कर दी थी। *कड़ी से कड़ी नहीं जुड़ी* जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने कहा कि पुलिस आरोपी के अंडरगारमेंट में मिले सीमेन का DNA टेस्ट करने में नाकाम रही, जिससे उसका मिलान पीड़ित के अंडरगारमेंट से लिए गए रेक्टल स्वैब से किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आखिरी बार साथ देखे जाने' वाली थ्योरी पर शक है और अभियोजन पक्ष के मामले की कड़ी में कई कड़ियां गायब थीं। *किसी को नहीं मिली सजा* कोर्ट ने उस व्यक्ति को बरी कर दिया, जिसने 17 साल जेल में बिताए थे। इस मामले के खत्म होने के नतीजे दुखद रहे। एक व्यक्ति ने एक ऐसे अपराध में अपने छोटे बच्चे को खो दिया जिसके लिए किसी को सजा नहीं मिली, वहीं दूसरी तरफ गलत तरीके से दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति ने अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे साल गंवा दिए। *मामले की जांच ही नहीं हुई* तीसरे मामले में बिहार में 25 साल पहले हुए एक मर्डर केस में ट्रायल कोर्ट और पटना हाई कोर्ट ने छह लोगों को दोषी ठहराया था। जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस चंद्रन की बेंच ने दोषियों को बरी करते हुए कहा कि सबूतों की पूरी तरह कमी है और चश्मदीदों के बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह मामला खराब जांच का नहीं, बल्कि जांच न होने का है।