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ग्लेशियर पिघले तो पहले बढ़ेगा पानी, फिर सूखने लगेंगी नदियां
September 15, 2026 Source: Indivox News
हिमालय तेजी से टिपिंग पॉइंट की ओर बढ़ रहा है. ग्लेशियर पहले से ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं. मध्य सदी तक पानी का बहाव आ जाएगा जिससे पानी की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी. लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है.
हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब साफ दिखने लगे हैं. हाल में जारी एक महत्वपूर्ण स्टडी के अनुसार हिमालय तेजी से एक खतरनाक मोड़ यानी टिपिंग पॉइंट की ओर बढ़ रहा है. ग्लेशियर एक दशक पहले की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं. इससे पानी की उपलब्धता पर गंभीर असर पड़ने वाला है.
स्टडी में चेतावनी दी गई है कि मध्य शताब्दी तक यह क्षेत्र पीक वॉटर यानी अधिकतम जल प्रवाह के बिंदु पर पहुंच जाएगा. उसके बाद नदियों का पानी कम होने लगेगा. यह बदलाव लाखों लोगों की आजीविका, खेती और पानी की सुरक्षा को सीधे प्रभावित करेगा.
अगस्त के अंत में नेपाल-तिब्बत सीमा पर एक हिमालयी ग्लेशियर के अचानक ढहने से भयानक आपदा आई. इससे घाटियों में एक के बाद एक भूस्खलन और बाढ़ आ गई. नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में अब तक 1300 से ज्यादा लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. 5300 से ज्यादा लोग अभी भी लापता हैं.
यह घटना ग्लेशियरों की बढ़ती अस्थिरता का जीवंत उदाहरण है. ग्लेशियर पीछे हटते जा रहे हैं और उनके पीछे अस्थिर झीलें बन रही हैं. ये झीलें सिर्फ ढीली चट्टानों और बर्फ से बंधी होती हैं. नीचे घाटियों में लाखों लोग रहते हैं. किसी भी समय ये झीलें फट सकती हैं और विनाशकारी बाढ़ ला सकती हैं.
स्टडी की मुख्य बातें और निगरानी की कमी
यह स्टडी सिस्टमिक नामक स्थिरता सलाहकार फर्म ने इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव, इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट और भारत के जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट के साथ मिलकर तैयार किया है. स्टडी में पाया गया कि हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों का द्रव्यमान हाल के दशकों में तेजी से घट रहा है. इस विशाल पर्वतीय प्रणाली में अफगानिस्तान से म्यांमार तक आठ देश शामिल हैं.
यहां अनुमानित 40 हजार ग्लेशियर हैं लेकिन जमीन पर सिर्फ 21 ग्लेशियरों की ही निगरानी हो रही है. भारत में करीब 200 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाला बताया गया है. इनमें से 56 को बहुत उच्च जोखिम की श्रेणी में रखा गया है. इनके नीचे रहने वाले लाखों लोग लगातार खतरे में हैं.
पानी की सुरक्षा और आर्थिक प्रभाव
जब क्षेत्र पीक वॉटर के करीब पहुंचेगा तो नदियों का प्रवाह पहले बढ़ेगा फिर घटने लगेगा. इससे पानी की सुरक्षा पर गहरा असर पड़ेगा. हिमालय भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह देश के सकल घरेलू उत्पाद का 20 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा प्रभावित करता है. सैकड़ों करोड़ लोग इन नदियों पर निर्भर हैं
हिमालय क्षेत्र भारत की भूमि का करीब 18 प्रतिशत हिस्सा है लेकिन प्राकृतिक आपदाओं में इसकी हिस्सेदारी लगभग 35 प्रतिशत है. ग्लेशियर पिघलने से बाढ़, भूस्खलन और सूखे जैसी आपदाएं और बढ़ सकती हैं. इससे खेती, जलविद्युत परियोजनाएं और रोजमर्रा की पानी की जरूरतें प्रभावित होंगी.
आगे की चुनौतियां और जरूरी कदम
हिमालय सिर्फ भारत के लिए नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए पानी का मुख्य स्रोत है. ग्लेशियरों की तेजी से हो रही हानि को रोकने के लिए बेहतर निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और जलवायु अनुकूलन की जरूरत है. स्थानीय समुदायों को तैयार करना और जोखिम भरी झीलों की लगातार जांच जरूरी है. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो लाखों लोगों की आजीविका और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकते हैं. यह स्टडी एक गंभीर चेतावनी है कि हिमालय अब बदलाव के निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है.