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Ground Level Ozone: गर्मी बढ़ते ही दिल्ली की हवा में घुल रहा जहर
May 7, 2026 Source: Indivox News
दिल्ली की हवा को लेकर एक नई और गंभीर चिंता सामने आई है। अब केवल पीएम2.5 और पीएम10 जैसे कणीय प्रदूषण ही नहीं, बल्कि ‘ग्राउंड लेवल ओजोन’ या ‘बैड ओजोन’ भी लोगों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह ओजोन वातावरण की ऊपरी परत में मौजूद सुरक्षात्मक ओजोन से पूरी तरह अलग है। जहां ऊपरी ओजोन परत पृथ्वी को सूरज की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से बचाती है, वहीं ग्राउंड लेवल ओजोन जमीन के करीब बनने वाली जहरीली गैस है, जो फेफड़ों और श्वसन तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि यह गैस सीधे वातावरण में नहीं छोड़ी जाती। यह तब बनती है जब वाहनों, फैक्ट्रियों और अन्य स्रोतों से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) तेज धूप और ऊंचे तापमान के संपर्क में आकर रासायनिक प्रतिक्रिया करते हैं। गर्मियों में तेज धूप और बढ़ते तापमान के कारण इसका स्तर तेजी से बढ़ जाता है। यही वजह है कि मई और जून जैसे महीनों में दिल्ली और एनसीआर के कई इलाकों में ओजोन प्रदूषण गंभीर रूप ले सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली में औसत वार्षिक ओजोन स्तर 2021 में 52 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो 2025 तक बढ़कर 66 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर पहुंच गया। इसके साथ ही ओजोन-प्रधान दिनों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस गैस के प्रभाव से सांस लेने में परेशानी, खांसी, गले और आंखों में जलन, अस्थमा और फेफड़ों की बीमारियां बढ़ सकती हैं। खासतौर पर बच्चे, बुजुर्ग, अस्थमा के मरीज और लंबे समय तक खुले में काम करने वाले लोग अधिक जोखिम में हैं।
दिल्ली में सर्दियों के दौरान जहां पीएम2.5 और पीएम10 का स्तर ज्यादा बढ़ता है, वहीं गर्मियों में ग्राउंड लेवल ओजोन सबसे बड़ा खतरा बनकर उभरता है। मानसून में बारिश और तेज हवाओं से कुछ राहत जरूर मिलती है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ओजोन की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती। नोएडा, मेरठ और अन्य एनसीआर शहरों में भी इसका स्तर तेजी से बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ग्राउंड लेवल ओजोन पर नियंत्रण करना पीएम2.5 की तुलना में ज्यादा मुश्किल है क्योंकि यह सीधे उत्सर्जित नहीं होता, बल्कि कई प्रदूषक गैसों और मौसम की परिस्थितियों के मिलकर बनने से तैयार होता है। इसलिए केवल ट्रैफिक कम करना या किसी एक फैक्ट्री को बंद करना पर्याप्त नहीं माना जाता। इसके लिए व्यापक और समन्वित प्रदूषण नियंत्रण रणनीति की जरूरत है। दिल्ली की वायु गुणवत्ता अब पहले से कहीं अधिक जटिल हो चुकी है और आने वाले समय में राजधानी को ‘अदृश्य प्रदूषण’ यानी ओजोन से बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।